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17 October 2026
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निर्माणाधीन फ्लैट का पैसा लौटाते समय ऋणदाता बैंक के धन और खरीदार के अपने भुगतान में अंतर करना होगा: माननीय सुप्रीम कोर्ट

खरीदार को अपने धन से किए गए ₹1,27,34,726 के भुगतान पर प्रत्येक भुगतान की तारीख से 12% वार्षिक साधारण ब्याज मिलेगा। ऋण से बिल्डर को दी गई, पर खरीदार द्वारा बैंक को वापस न…
CourtThe Supreme Court of India
CaseK. MADHUSUDHAN RAO VS. M/S LODHA HEALTHY CONSTRUCTIONS AND DEVELOPER PRIVATE LIMITED (LHCPL) Case Number: Civil Appeal No. 8994 of 2022 और Civil Appeal Nos. 4622-4623 of 2023
Bench / Coramमाननीय न्यायमूर्ति Pamidighantam Sri Narasimha और माननीय न्यायमूर्ति Alok Aradhe
Citation2026 INSC 1131 Decision
Key Points / एक नज़र में
  • खरीदार को अपने धन से किए गए ₹1,27,34,726 के भुगतान पर प्रत्येक भुगतान की तारीख से 12% वार्षिक साधारण ब्याज मिलेगा।
  • ऋण से बिल्डर को दी गई, पर खरीदार द्वारा बैंक को वापस न की गई राशि खरीदार को व्यक्तिगत रूप से देना अनुचित समृद्धि होगा।
  • Clause 24 के तहत तय 12% ब्याज लागू हुआ; 18% ब्याज स्वतः या एकसमान नियम के रूप में नहीं दिया गया।

विस्तृत विश्लेषण

Legal Analysis • Vakeel Sahab

खरीदार को अपने धन से किए गए ₹1,27,34,726 के भुगतान पर प्रत्येक भुगतान की तारीख से 12% वार्षिक साधारण ब्याज मिलेगा। ऋण से बिल्डर को दी गई, पर खरीदार द्वारा बैंक को वापस न की गई राशि खरीदार को व्यक्तिगत रूप से देना अनुचित समृद्धि होगा। Clause 24 के तहत तय 12% ब्याज लागू हुआ; 18% ब्याज स्वतः या एकसमान नियम के रूप में नहीं दिया गया।

Court: The Supreme Court of India

Case Name: K. MADHUSUDHAN RAO VS. M/S LODHA HEALTHY CONSTRUCTIONS AND DEVELOPER PRIVATE LIMITED (LHCPL)

Case Number: Civil Appeal No. 8994 of 2022 और Civil Appeal Nos. 4622-4623 of 2023

Case-number verification: निर्णय-पाठ में अपीलकर्ता का नाम Madhu Kudapa (formerly known as K. Madhusudhan Rao) है; trusted metadata में पुराना नाम K. Madhusudhan Rao दिया गया है।

Bench: माननीय न्यायमूर्ति Pamidighantam Sri Narasimha और माननीय न्यायमूर्ति Alok Aradhe

Neutral Citation: 2026 INSC 1131

Decision Date: 2026-10-15

मामला क्या था?

खरीदार ने Lodha Bellezza परियोजना में अपार्टमेंट बुक किया और कीमत का एक हिस्सा स्वयं दिया, जबकि शेष के लिए बैंक ने बिल्डर को ऋण की किश्तें सीधे जारी कीं। पर्याप्त भुगतान के बावजूद बिल्डर समय पर कब्जा नहीं दे पाया। खरीदार ने उपभोक्ता आयोग में धन-वापसी और अन्य राहतें मांगीं। आयोग ने बिल्डर को पूरी जमा राशि ब्याज सहित लौटाने और बैंक को सेवा में कमी के लिए ₹2 लाख देने का आदेश दिया। बिल्डर ने जमा राशि आयोग के पास जमा की; खरीदार और बैंक ने आयोग के आदेश को चुनौती दी।

मुख्य कानूनी प्रश्न

निर्माणाधीन आवासीय परियोजना में देरी के बाद वापसी की राशि किसे और कितनी दी जाए, जब भुगतान खरीदार के अपने धन और बैंक ऋण—दोनों से हुआ हो; ब्याज, किराये तथा अन्य क्षतिपूर्ति का दावा कैसे तय हो; और क्या निर्माण-प्रगति की जाँच किए बिना ऋण की किश्तें जारी करना बैंक की सेवा में कमी है।

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

खरीदार को उसके अपने धन से किए गए कुल ₹1,27,34,726 के भुगतान पर, प्रत्येक भुगतान की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 12% वार्षिक साधारण ब्याज सहित धन-वापसी मिलेगी। ₹15 लाख अतिरिक्त क्षतिपूर्ति किराये, मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमे के खर्चों के पूर्ण और अंतिम निपटारे के लिए दी गई। ऋण से चुकाई गई, पर खरीदार द्वारा बैंक को वापस न की गई राशि खरीदार को व्यक्तिगत रूप से नहीं दी जा सकती; शेष जमा राशि बैंक की वसूली संबंधी लंबित अपील के परिणाम के अधीन रहेगी। बैंक के विरुद्ध सेवा में कमी का निष्कर्ष और ₹2 लाख का आदेश कायम रखा गया।

न्यायालय की प्रमुख reasoning

निर्णय ने अनुचित समृद्धि के सिद्धांत और Indian Contract Act, 1872 की Sections 64, 65, 70 और 72 का उल्लेख करते हुए कहा कि खरीदार को ऐसा धन नहीं मिलना चाहिए जिसे उसने स्वयं चुकाया ही नहीं और जो ऋण के रूप में अभी बकाया है। Tripartite Agreement में बैंक की ओर से बिल्डर को भुगतान को खरीदार को भुगतान मानने की व्यवस्था ऋण चुकाने की जिम्मेदारी तय करती है, लेकिन अवैतनिक उधार को खरीदार का अपना धन नहीं बनाती। Agreement for Sale की Clause 24 में 12% ब्याज तय था; इसलिए प्रत्येक भुगतान पर उसी दर से ब्याज दिया गया, न कि 18% की एकसमान दर। किराये का अतिरिक्त दावा, ब्याज के साथ उसी नुकसान के लिए दोहरी क्षतिपूर्ति बन सकता था; दावा pleadings और प्रमाण से भी आगे बढ़ा था, और खरीदार ने refund चुनकर अपार्टमेंट का दावा छोड़ दिया था। फिर भी लंबे समय तक धन और अपार्टमेंट से वंचित रहने की परिस्थितियों में ₹15 लाख क्षतिपूर्ति दी गई। बैंक की सेवा में कमी का निष्कर्ष इस आधार पर कायम रहा कि बैंक ने निर्माण-प्रगति सत्यापित करने के अपने दायित्व के बावजूद निरीक्षण रिपोर्ट पेश नहीं की।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  • खरीदार को अपने धन से किए गए ₹1,27,34,726 के भुगतान पर प्रत्येक भुगतान की तारीख से 12% वार्षिक साधारण ब्याज मिलेगा।
  • ऋण से बिल्डर को दी गई, पर खरीदार द्वारा बैंक को वापस न की गई राशि खरीदार को व्यक्तिगत रूप से देना अनुचित समृद्धि होगा।
  • Clause 24 के तहत तय 12% ब्याज लागू हुआ; 18% ब्याज स्वतः या एकसमान नियम के रूप में नहीं दिया गया।
  • refund चुनने के बाद किराये का अतिरिक्त दावा उसी नुकसान के लिए दोहरी क्षतिपूर्ति हो सकता है; इस मामले में दावा प्रमाण और pleadings की सीमाओं से भी प्रभावित था।
  • ₹15 लाख की क्षतिपूर्ति किराये, मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमे के खर्चों के पूर्ण एवं अंतिम निपटारे के लिए है। यह राशि ₹2 लाख से अलग है, जो बैंक की सेवा में कमी के लिए कायम रही। ***(review???)**

इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव

ऐसे मामलों में उपभोक्ता आयोग या अदालत को बिल्डर से वसूली गई राशि का स्रोत देखना चाहिए: खरीदार के अपने भुगतान की वापसी खरीदार को और अवैतनिक ऋण से आई राशि का निपटारा ऋणदाता के दावे के अनुसार होना चाहिए। समझौते में तय ब्याज-दर महत्वपूर्ण होगी, और उसी चूक के लिए ब्याज तथा किराया दोनों मांगने पर दोहरी क्षतिपूर्ति का प्रश्न उठ सकता है। बैंक यदि निर्माण-प्रगति जाँचने के वचन के आधार पर किश्तें जारी करता है, तो जाँच का प्रमाण प्रस्तुत करना प्रासंगिक हो सकता है। बैंक की ऋण-वसूली का प्रश्न इस उपभोक्ता कार्यवाही में तय नहीं हुआ; उसे उच्च न्यायालय में लंबित अपील में गुण-दोष के आधार पर तय किया जाना है।

Source check: निर्णय-पाठ में REPORTABLE अंकित है। पाठ में Civil Appeal No. 8994 of 2022 तथा Civil Appeal Nos. 4622-4623 of 2023 दर्ज हैं; केवल metadata के Case Number को आधार नहीं बनाया गया।
Advocate Amardeep Jaiswal
About the Author / लेखक परिचय

Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

Editorial note: यह लेख कानूनी जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित है। Judgment/official source उपलब्ध होने पर authoritative text के लिए मूल स्रोत को प्राथमिकता दें।
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