सरकारी निविदा में H1 स्थिति अपने-आप अनुबंध का अधिकार नहीं देती, लेकिन बोली अस्वीकार करने का विवेकाधिकार Article 14 के अधीन है। पुरानी बोली नई नीलामी के मूल्य का स्थायी न्यूनतम मानक नहीं बन जाती। पुरानी और नई रकम का अंतर अपने-आप वर्तमान बाजार में कम मूल्य या राजस्व-हानि सिद्ध नहीं करता; निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक समर्थनकारी सामग्री चाहिए।
Court: The Supreme Court of India
Case Name: M/S DHANLAXMI MERCHANDISE PVT. LTD. VS. STATE OF MADHYA PRADESH
Case Number: Civil Appeal No. 13749 of 2026 (SLP (C) No. 11388 of 2026 से उत्पन्न), तथा Civil Appeal No. 13750 of 2026 (SLP (C) No. 11160 of 2026 से उत्पन्न)
Case-number verification: मेटाडेटा में केवल Civil Appeal No. 13749 of 2026 दिया गया है; निर्णय-पाठ में इसके साथ Sahakar Global Ltd. की Civil Appeal No. 13750 of 2026 भी दर्ज है।
Bench: माननीय न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और माननीय न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली
Neutral Citation: 2026 INSC 1125
Decision Date: 2026-10-14
मामला क्या था?
मध्य प्रदेश राज्य खनन निगम ने शाहडोल और कटनी के रेत खनन समूहों के लिए सितंबर 2025 में नई ई-टेंडर-कम-ई-नीलामी कराई। दोनों अपीलकर्ता पहले इन समूहों के ठेकेदार थे, अपने पुराने ठेके सरेंडर कर चुके थे और नई नीलामी में क्रमशः H1 बने। उनकी नई वार्षिक बोलियाँ—शाहडोल के लिए ₹48,20,40,000 और कटनी के लिए ₹54,07,41,111—आरक्षित मूल्य से अधिक थीं, लेकिन उनकी पुरानी बोलियों से कम थीं। निगम के निदेशक मंडल ने इस अंतर को आधार बनाकर बोलियाँ अस्वीकार कीं और प्रक्रिया रद्द कर दी। उच्च न्यायालय ने रद्दीकरण कायम रखा; अपीलकर्ताओं ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
मुख्य कानूनी प्रश्न
क्या राज्य की खनन निगम किसी पूर्व ठेके को सरेंडर कर उसी समूह की नई ई-नीलामी में भाग लेने वाले H1 बोलीदाता की बोली केवल इसलिए रद्द कर सकती है कि उसकी नई बोली उसकी पुरानी बोली से काफी कम थी—जबकि लागू नियमों में पुनः भाग लेने पर रोक नहीं थी और नई बोली आरक्षित मूल्य से ऊपर थी?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने रद्दीकरण को अस्थिर ठहराया। लागू 2025 नियमों में ठेका सरेंडर करने वाले MDO को उसी समूह की नई नीलामी में भाग लेने से रोकने या उसकी नई बोली को पुरानी बोली के बराबर रखने की शर्त नहीं थी। पुरानी बोली प्रासंगिक हो सकती है, पर अकेले वही यह साबित नहीं करती कि नई प्रतिस्पर्धी बोली मौजूदा बाजार मूल्य से कम या अस्वीकार्य थी। निगम के पास वर्तमान मूल्यांकन, तुलनीय नीलामी या अन्य पर्याप्त सामग्री नहीं थी जिससे यह निष्कर्ष समर्थित होता। अपीलें स्वीकार कर रद्दीकरण और उच्च न्यायालय का निर्णय निरस्त किया गया तथा 2025 की निविदा प्रक्रिया बहाल की गई।
न्यायालय की प्रमुख reasoning
H1 होना अपने-आप ठेका पाने का अटल अधिकार नहीं देता और आरक्षित मूल्य से ऊपर की बोली स्वीकार करना भी अनिवार्य नहीं है। फिर भी निविदा की शर्तों में रद्दीकरण का अधिकार सार्वजनिक प्राधिकरण को Article 14 के अधीन निष्पक्ष और गैर-मनमाने ढंग से इस्तेमाल करना होगा। यहाँ निगम ने पुरानी और नई बोलियों का अंतर दर्ज किया, पर यह नहीं दिखाया कि पुरानी रकम अक्टूबर 2025 में भी बाजार से वाजिब तौर पर मिलने योग्य थी। नीलामी में कई योग्य प्रतिभागियों ने प्रतिस्पर्धा की और प्रक्रिया में मिलीभगत, तकनीकी अयोग्यता या प्रक्रिया-दोष का निष्कर्ष नहीं था। जनवरी 2026 में जो नई भागीदारी-रोक और नुकसान-वसूली व्यवस्था जोड़ी गई, उसे पहले की नीलामी पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
निर्णय के मुख्य बिंदु
- सरकारी निविदा में H1 स्थिति अपने-आप अनुबंध का अधिकार नहीं देती, लेकिन बोली अस्वीकार करने का विवेकाधिकार Article 14 के अधीन है।
- पुरानी बोली नई नीलामी के मूल्य का स्थायी न्यूनतम मानक नहीं बन जाती।
- पुरानी और नई रकम का अंतर अपने-आप वर्तमान बाजार में कम मूल्य या राजस्व-हानि सिद्ध नहीं करता; निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक समर्थनकारी सामग्री चाहिए।
- 2025 में लागू Rule 16 ने सरेंडर करने वाले MDO को उसी समूह की नई नीलामी में भाग लेने से नहीं रोका था।
- 30.01.2026 का संशोधन पहले आयोजित 2025 नीलामी पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
शाहडोल और कटनी के लिए 18.09.2025 की निविदा प्रक्रिया बहाल की गई। दोनों अपीलकर्ताओं को दो सप्ताह में अपनी अंतिम बोलियों पर बिना शर्त कायम रहने की सहमति देनी थी; इसके बाद निगम को शेष जमानत, सुरक्षा और अन्य निविदा औपचारिकताओं की सूचना देकर अनुपालन पर आवंटन प्रक्रिया पूरी करनी थी। निगम उन्हीं अपीलकर्ताओं की बोलियाँ फिर से पुराने ठेकों के सरेंडर, पुरानी बोलियों से कम नई रकम या 30.01.2026 के संशोधन को पिछली नीलामी पर लागू करने के आधार पर अस्वीकार नहीं कर सकता। फरवरी 2026 की बाद की निविदा इन दोनों समूहों के लिए आगे नहीं बढ़ेगी। पुराने ठेकों के बकाया, खातों और वसूली के प्रश्न खुले रखे गए।
Source check: निर्णय-पाठ में इसे NON-REPORTABLE कहा गया है। पाठ में दोनों अपीलों और उनके संबंधित SLP नंबर दर्ज हैं; विवरण उसी के अनुसार दिया गया है।
Original Judgment / Source: The Supreme Court of India — Official Judgment PDF