रेलवे दुर्घटना में टिकट न मिले तो भी मिल सकता है मुआवजा: कलकत्ता हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
August 27, 2026
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रेलवे दुर्घटना में टिकट न मिले तो भी मिल सकता है मुआवजा: कलकत्ता हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
रेलवे दुर्घटना के बाद मृतक यात्री के पास टिकट न मिलना या टिकट की बरामदगी पर विवाद होना अक्सर रेलवे क्लेम खारिज होने का प्रमुख कारण बन जाता है। लेकिन केवल टिकट उपलब्ध न होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृतक बिना टिकट यात्रा कर रहा था। कलकत्ता हाई कोर्ट ने Rumpa Mallick & Ors. v. Union of India, F.M.A. 1315 of 2025, निर्णय दिनांक 30 जून 2026, में इसी सिद्धांत को दोहराते हुए पीड़ित परिवार के पक्ष में ₹8 लाख मुआवजे का आदेश दिया।
यह निर्णय रेलवे दुर्घटना दावों में टिकट, पुलिस रिकॉर्ड, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और प्रमाण के भार से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को स्पष्ट करता है।
क्या था पूरा मामला?
मृतक ने 1 अक्टूबर 2018 को बैद्यबाटी से बेलूर की यात्रा के लिए वापसी टिकट खरीदा था। रात में बंडेल लोकल ट्रेन से लौटते समय वह रिशड़ा और श्रीरामपुर स्टेशनों के बीच चलती ट्रेन से गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई। शेओराफुली जीआरपीएस ने अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज कर पंचनामा तथा अन्य जाँच की।
पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार मृतक के शव से रेलवे टिकट बरामद हुआ था और उसकी जब्ती सूची भी तैयार की गई थी। दूसरी ओर, रेलवे की आंतरिक जाँच में टिकट, पास या अन्य यात्रा प्राधिकार मिलने से इनकार किया गया। इसी विरोधाभास के आधार पर रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, कोलकाता ने परिवार का मुआवजा दावा खारिज कर दिया था। पीड़ित परिवार ने इस आदेश को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने क्या निर्णय दिया?
कलकत्ता हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश निरस्त करते हुए माना कि उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड, जब्ती सूची, मृतक की पत्नी की मौखिक गवाही और घटना की परिस्थितियाँ यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त थीं कि मृतक एक वास्तविक यात्री था और उसकी मृत्यु रेलवे अधिनियम के अंतर्गत “अप्रिय घटना” अर्थात Untoward Incident में हुई थी।
अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह:
पीड़ित परिवार को ₹8,00,000 मुआवजा दे;
दावा प्रस्तुत करने की तारीख से निर्णय तक 6% वार्षिक ब्याज दे; और
निर्धारित राशि को आठ सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष जमा करे।
टिकट न मिलना अपने आप में क्लेम खारिज करने का आधार क्यों नहीं है?
रेलवे दुर्घटना प्रायः अचानक होती है। चलती ट्रेन से गिरने, टक्कर लगने, भीड़, बचाव कार्य या शव को अस्पताल ले जाने के दौरान टिकट गुम या नष्ट हो सकता है। इसलिए केवल यह कहना कि मृतक के पास टिकट नहीं मिला, प्रत्येक मामले में उसे बिना टिकट यात्री सिद्ध नहीं करता।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय Union of India v. Rina Devi, (2019) 3 SCC 572 में निर्धारित सिद्धांत लागू किया। उस निर्णय के अनुसार केवल रेलवे परिसर में शव मिलना अपने आप में मृतक को वास्तविक यात्री सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है; लेकिन टिकट का न मिलना भी अपने आप दावा समाप्त नहीं करता। दावेदार घटना और यात्रा से जुड़े प्रासंगिक तथ्यों का शपथपत्र तथा सहायक साक्ष्य देकर प्रारंभिक भार पूरा कर सकते हैं। इसके बाद उन तथ्यों का खंडन करने का भार रेलवे पर स्थानांतरित हो जाता है।
क्या हर मामले में प्रत्यक्षदर्शी आवश्यक है?
नहीं। परिवार के सदस्य प्रायः यात्री के साथ ट्रेन में उपस्थित नहीं होते। उनसे यह अपेक्षा करना अव्यावहारिक होगा कि वे टिकट खरीदते हुए देखने वाला व्यक्ति या दुर्घटना का प्रत्यक्षदर्शी अवश्य प्रस्तुत करें।
ऐसी स्थिति में अदालत निम्न साक्ष्यों को समग्र रूप से देख सकती है:
जीआरपी या स्थानीय पुलिस की एफआईआर अथवा मर्ग सूचना;
पंचनामा और जब्ती सूची;
पोस्टमार्टम रिपोर्ट;
अंतिम पुलिस जाँच रिपोर्ट;
स्टेशन मास्टर, लोको पायलट या रेलवे कर्मचारियों की रिपोर्ट;
मृतक की यात्रा के उद्देश्य और गंतव्य से जुड़े तथ्य;
परिवार के सदस्यों या सहयात्रियों की मौखिक गवाही; और
घटना-स्थल तथा चोटों की प्रकृति से प्राप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि विधिवत पुलिस जाँच में तैयार रिकॉर्ड को केवल रेलवे की विरोधी आंतरिक रिपोर्ट के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि रेलवे पुलिस दस्तावेजों को अविश्वसनीय बताना चाहता है, तो उसे प्रभावी साक्ष्य प्रस्तुत करना होगा। संबंधित जाँच अधिकारी से पूछताछ किए बिना पुलिस रिकॉर्ड को सीधे अस्वीकार करना उचित नहीं माना गया।
रेलवे अधिनियम की धारा 124-A का महत्व
रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 124-A “untoward incident” के कारण यात्री की मृत्यु या चोट के मामलों में रेलवे प्रशासन की मुआवजा देयता से संबंधित है। सामान्यतः दावेदार को रेलवे की लापरवाही अलग से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। इसे व्यापक रूप से strict liability की व्यवस्था माना जाता है।
हालाँकि, आत्महत्या या आत्महत्या का प्रयास, स्वयं को जानबूझकर पहुँचाई गई चोट, स्वयं का आपराधिक कृत्य, नशे या विक्षिप्तता के कारण किया गया कृत्य तथा प्राकृतिक कारण या बीमारी जैसी वैधानिक अपवाद स्थितियों में मुआवजा रोका जा सकता है। इसलिए प्रत्येक मामले के दस्तावेज और परिस्थितियाँ अलग-अलग जाँचना आवश्यक है।
पीड़ित परिवार को घटना के बाद क्या करना चाहिए?
रेलवे दुर्घटना में मृत्यु या गंभीर चोट होने पर परिवार को प्रारंभ से ही दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। विशेष रूप से:
जीआरपी/आरपीएफ या संबंधित पुलिस थाने की रिपोर्ट और केस नंबर प्राप्त करें।
पंचनामा, जब्ती सूची, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अंतिम जाँच रिपोर्ट की प्रमाणित प्रतियाँ लें।
टिकट, मोबाइल टिकट, यूटीएस ऐप रिकॉर्ड, बैंक/यूपीआई भुगतान, पास या आरक्षण संदेश उपलब्ध हो तो सुरक्षित रखें।
मृतक कहाँ से चला था, कहाँ जा रहा था और किस उद्देश्य से यात्रा कर रहा था—इससे संबंधित साक्ष्य जुटाएँ।
रेलवे या पुलिस रिकॉर्ड में विरोधाभास हो तो उसकी प्रतियाँ लेकर समय रहते विधिक आपत्ति उठाएँ।
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के क्षेत्राधिकार और दावा प्रस्तुत करने की समय-सीमा के संबंध में शीघ्र कानूनी सलाह लें।
क्या प्रत्येक टिकट-विहीन मामले में मुआवजा निश्चित है?
नहीं। इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि टिकट न मिलने वाले प्रत्येक मामले में मुआवजा स्वतः मिल जाएगा। दावेदार को कम-से-कम ऐसे विश्वसनीय तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे जिनसे वास्तविक रेल यात्रा और untoward incident की प्रथम दृष्टया संभावना स्थापित हो। यदि रिकॉर्ड से यह सिद्ध हो कि व्यक्ति यात्री नहीं था, घटना रेलवे अधिनियम के वैधानिक अपवाद में आती है या दावा मनगढ़ंत है, तो क्लेम अस्वीकार हो सकता है।
अतः सही कानूनी निष्कर्ष यह है कि टिकट का न मिलना एक महत्वपूर्ण परिस्थिति हो सकती है, लेकिन अकेले यही तथ्य मुआवजा दावा खारिज करने के लिए निर्णायक नहीं है।
निष्कर्ष
कलकत्ता हाई कोर्ट का यह निर्णय रेलवे दुर्घटना पीड़ित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण राहत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रेलवे मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है और दावों का निर्णय केवल तकनीकी कमियों पर नहीं, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड, मौखिक गवाही और सभी परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन पर किया जाना चाहिए।
यदि रेलवे दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु या गंभीर चोट हुई है और टिकट उपलब्ध नहीं है, तब भी दावा तुरंत छोड़ देना उचित नहीं है। पंचनामा, पुलिस जाँच, पोस्टमार्टम, यात्रा से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड और पारिवारिक गवाही के आधार पर उचित मामला प्रस्तुत किया जा सकता है।
मामला: Rumpa Mallick & Ors. v. Union of India
केस नंबर: F.M.A. 1315 of 2025
न्यायालय: High Court at Calcutta
न्यायाधीश: Justice Biswaroop Chowdhury
निर्णय दिनांक: 30 जून 2026
अस्वीकरण: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। प्रत्येक मामले के तथ्य और दस्तावेज अलग होते हैं; किसी कार्रवाई से पहले योग्य अधिवक्ता से परामर्श लें।
लेखक / परामर्शदाता
Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh
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Disclaimer: This article is for educational purposes only and should not be considered legal advice.
अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।