← Back to Insights
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य

August 10, 2026

*Parvinder Singh v. Directorate of Enforcement— 2026 INSC 519**

भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में **निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial)** के अधिकार को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

*Parvinder Singh v. Directorate of Enforcement* मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि **BNSS की धारा 223(1) के प्रथम प्रावधान के तहत शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।**

इस फैसले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कोर्ट ने बिना सुनवाई के लिए गए संज्ञान को महज एक **procedural irregularity** नहीं माना, बल्कि ऐसी कानूनी त्रुटि माना जो **संज्ञान के आदेश और उससे आगे की कार्यवाही को प्रभावित करती है।**

## मामला क्या था?

मामला **प्रवर्तन निदेशालय (ED)** द्वारा दर्ज की गई कार्यवाही से संबंधित था। आरोपी पर **Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA)** के तहत कार्रवाई की गई थी।

ED ने 24 जून 2024 को Special Court के समक्ष prosecution complaint दाखिल की। उस समय **BNSS अभी लागू नहीं हुआ था**, क्योंकि BNSS 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुआ।

Special Court ने शिकायत पर संज्ञान लेने की तारीख 2 जुलाई 2024 तय की। इस बीच BNSS लागू हो चुका था और 2 जुलाई 2024 को Special Court ने आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना PMLA के अपराधों पर संज्ञान ले लिया।

आरोपी ने बाद में संज्ञान के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि **BNSS की धारा 223(1) के प्रथम प्रावधान का पालन नहीं किया गया**, क्योंकि संज्ञान लेने से पहले उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था।

## BNSS की धारा 223(1) में क्या महत्वपूर्ण है?

BNSS की धारा 223 शिकायत से संबंधित प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके प्रथम प्रावधान में यह महत्वपूर्ण सुरक्षा दी गई है कि **आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना संज्ञान नहीं लिया जाएगा।**

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं माना, बल्कि आरोपी के अधिकार और न्यायालय की संज्ञान लेने की शक्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रावधान माना है।

अर्थात् शिकायत के आधार पर जब न्यायालय संज्ञान लेने के चरण पर पहुंचता है, तो कानून द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में आरोपी को अपनी बात रखने का अवसर देना आवश्यक है।

# सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि **BNSS की धारा 223(1) के प्रथम प्रावधान का पालन किए बिना लिया गया संज्ञान का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता।**

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल ऐसी procedural irregularity नहीं है जिसे बाद में आसानी से ठीक किया जा सके। कोर्ट के अनुसार यह ऐसी **illegality** है जो संज्ञान की कार्यवाही को ही प्रभावित करती है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने:

* उत्तराखंड हाई कोर्ट का संबंधित निर्णय रद्द किया;
* Special Court द्वारा 2 जुलाई 2024 को लिया गया cognizance order set aside किया;
* और Special Court को निर्देश दिया कि वह **संज्ञान लेने के चरण से कार्यवाही दोबारा शुरू करे तथा आरोपी को सुनवाई का अवसर दे।**

## शिकायत दाखिल होने और संज्ञान लेने में क्या अंतर है?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है।

केवल न्यायालय में complaint दाखिल हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय ने उसका **cognizance** ले लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि complaint को केवल register करना या उसे भविष्य में cognizance के लिए सूचीबद्ध करना अपने-आप में judicial inquiry नहीं है। **Cognizance वह चरण है जहां न्यायालय अपना judicial mind लागू करता है और अपराध का judicial notice लेता है।**

इस मामले में complaint 24 जून 2024 को दाखिल हो गई थी, लेकिन cognizance 2 जुलाई 2024 को लिया गया। चूंकि 1 जुलाई 2024 से BNSS लागू हो चुका था, इसलिए उस समय BNSS के लागू प्रावधानों का पालन करना आवश्यक था।

# PMLA मामलों में इस फैसले का विशेष महत्व

यह मामला **PMLA** से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस अवसर पर यह भी स्पष्ट किया कि PMLA की Section 44(1)(b) के तहत ED द्वारा दाखिल complaint पर complaint procedure से संबंधित CrPC/अब BNSS के प्रावधान लागू होते हैं, जब तक PMLA में उसके विपरीत कोई विशेष प्रावधान न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णयों—**Tarsem Lal v. Enforcement Directorate, Yash Tuteja v. Union of India और Kaushal Kumar Agarwal v. Directorate of Enforcement**—का भी उल्लेख किया और इस सिद्धांत को दोहराया।

इसका अर्थ है कि PMLA complaint proceedings में भी complaint procedure को नजरअंदाज करके सीधे cognizance लेना उचित नहीं होगा।

# क्या इसका मतलब है कि हर FIR से पहले आरोपी को सुनना जरूरी है?

**नहीं। यह इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण सीमा है।**

सोशल मीडिया पर इस फैसले को कई जगह इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि:

>"अब किसी भी FIR या शिकायत पर कार्रवाई से पहले आरोपी को सुनना अनिवार्य है।"

यह प्रस्तुति **भ्रामक हो सकती है।**

Supreme Court का फैसला विशेष रूप से **complaint proceedings और cognizance के चरण** से संबंधित है। इसे इस अर्थ में नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि पुलिस को प्रत्येक FIR दर्ज करने से पहले आरोपी को notice देकर उसकी hearing करनी ही होगी।

इसलिए **FIR, police investigation, charge-sheet और private complaint के procedural stages को आपस में मिलाना उचित नहीं है।**

# Fair Trial के अधिकार को मिली मजबूती

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में आरोपी के **fair trial और personal liberty** से जुड़े अधिकारों को विशेष महत्व दिया।

कोर्ट ने माना कि जब कानून स्वयं आरोपी को सुनवाई का अधिकार देता है, तो उसका पालन केवल औपचारिकता मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। आरोपी को सुनवाई दिए बिना संज्ञान लेना उस वैधानिक सुरक्षा को कमजोर कर देगा जो BNSS ने प्रदान की है।

इसलिए यह फैसला **Natural Justice, Fair Trial और Personal Liberty** के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।

## वकीलों और आरोपियों के लिए व्यावहारिक महत्व

यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध **private complaint या ऐसी विशेष complaint proceeding** चल रही है जिसमें BNSS की धारा 223(1) लागू होती है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि:

1. शिकायत कब दाखिल हुई?
2. BNSS उस समय लागू था या नहीं?
3. न्यायालय ने cognizance कब लिया?
4. क्या cognizance लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया गया?
5. क्या न्यायालय ने धारा 223(1) के प्रथम प्रावधान का पालन किया?
6. क्या संबंधित विशेष कानून में BNSS की इस प्रक्रिया को हटाने या बदलने वाला कोई विशेष प्रावधान है?

यदि अनिवार्य hearing के बिना cognizance लिया गया है, तो **Parvinder Singh का निर्णय महत्वपूर्ण legal ground प्रदान कर सकता है।**

# निष्कर्ष

**Parvinder Singh v. Directorate of Enforcement, 2026 INSC 519** भारतीय आपराधिक कानून में एक महत्वपूर्ण निर्णय है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि **जहां BNSS की धारा 223(1) का प्रथम प्रावधान लागू होता है, वहां complaint पर cognizance लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।**

बिना इस अवसर के लिया गया cognizance केवल एक छोटी procedural गलती नहीं है, बल्कि ऐसी कानूनी त्रुटि हो सकती है जो **cognizance order को ही प्रभावित कर दे।**

हालांकि, इस फैसले को यह कहकर प्रचारित करना कि **"अब हर FIR दर्ज करने से पहले आरोपी को सुनना अनिवार्य है"**, सही कानूनी निष्कर्ष नहीं होगा। फैसले को **complaint और cognizance के वास्तविक procedural context** में समझना आवश्यक है l

**अस्वीकरण:** यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और शैक्षणिक उद्देश्य से है। किसी विशेष मामले में कानूनी रणनीति तय करने से पहले संबंधित रिकॉर्ड, complaint, cognizance order और लागू विशेष कानून का स्वतंत्र परीक्षण आवश्यक है।

लेखक / परामर्शदाता

Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh

यदि आप इस विषय पर अधिक जानकारी चाहते हैं या किसी कानूनी समस्या का सामना कर रहे हैं, तो नीचे दिए गए विकल्पों से संपर्क कर सकते हैं।

हमसे जुड़ें और उपयोगी कानूनी जानकारी साझा करें

Google Business पर हमारी जानकारी देखें, review दें, Facebook पर follow करें अथवा इस लेख को अपने परिचितों के साथ साझा करें।

Disclaimer: This article is for educational purposes only and should not be considered legal advice.

अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।